गोरखपुर, 5 अप्रैल . पौराणिक कथाओं का जीवंत चित्रण जब श्रद्धा, कला और भावनाओं से सराबोर होकर मंच पर उतरता है, तो वह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि वह एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है. कुछ ऐसा ही दृश्य गोरखपुर के भारत सेवाश्रम संघ में देखने को मिला, जहाँ चैत्र रामनवमी एवं बसंती दुर्गा पूजा महोत्सव के अंतर्गत महाअष्टमी की संध्या पर आयोजित ‘समुद्र मंथन’ की भव्य नृत्य-नाटिका ने उपस्थित जनसमुदाय को मंत्रमुग्ध कर दिया.
यह नाटिका श्री गुरु नित्यांगना ग्रुप के प्रशिक्षित बाल कलाकारों द्वारा प्रस्तुत की गई. मंच पर जब देवता और दैत्य वासुकी नाग को पकड़े, मंदराचल पर्वत को मथानी बना समुद्र मंथन करते दिखाई दिए, तो ऐसा लगा जैसे पुराणों की कथा सजीव होकर वर्तमान में उतर आई हो. भावों की तीव्रता, संगीत की लहरियाँ, नृत्य की लयात्मकता और मंच सज्जा की भव्यता ने दर्शकों को एक अलौकिक लोक में पहुँचा दिया.
कथानक की सजीवता और सांस्कृतिक सघनता
नाटिका में समुद्र मंथन से उत्पन्न चंद्रमा, लक्ष्मी, ऐरावत, कौस्तुभ मणि, धनवंतरि और अमृत जैसे रत्नों की झलकियाँ दर्शकों को विस्मित करती रहीं. भगवान शिव का कालकूट विष का पान कर नीलकंठ बनना, भगवान विष्णु का मोहिनी रूप धारण कर अमृत का वितरण करना, और राहु-केतु की उत्पत्ति जैसे प्रसंग इतने कलात्मक ढंग से मंचित किए गए कि दर्शकों की आँखें भावविभोर हो उठीं.
बाल कलाकारों की अद्भुत प्रस्तुति
इस भव्य प्रस्तुति में अंश, राहुल, कुशाग्र, चित्रांश, हिरेन, हर्षित, उत्कर्ष, केशव, काव्या, आराध्या, आरण्या, लावण्या, नम्रता, आकर्षि, अंशिका, तृषा, पंखुड़ी, जानवी, मनी, साध्वी, मान्यता और पूर्वा जैसे बाल कलाकारों ने भाग लिया. इन सभी ने अत्यंत अनुशासन, उत्साह और समर्पण के साथ अपने-अपने पात्रों को निभाया. उनकी वेशभूषा, नृत्य मुद्राएँ और संवाद-शैली में ऐसा सौंदर्य और गहराई थी कि पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया.
कार्यक्रम के उपरांत भारत सेवाश्रम संघ के पूज्य स्वामीजी स्वयं मंच पर पधारे और सभी बाल कलाकारों को मेडल, प्रमाण पत्र और पुरस्कार प्रदान कर उनका उत्साहवर्धन किया.
उन्होंने कहा “इन बच्चों की प्रस्तुतियाँ केवल अभिनय नहीं हैं, यह हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत की ध्वनि हैं. जब नई पीढ़ी हमारे धर्म और मूल्यों को आत्मसात कर उन्हें मंच पर जीवंत करती है, तब यह नाट्यकला एक सत्संग बन जाती है, एक साधना बन जाती है.”
कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए, जिनमें शहर के अनेक शिक्षाविद्, समाजसेवी, कला प्रेमी एवं अभिभावक भी शामिल रहे. दर्शकों ने पूरी प्रस्तुति को बारंबार तालियों से सराहा. कई लोगों ने कहा कि यह आयोजन न केवल बच्चों के प्रतिभा प्रदर्शन का मंच था, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक प्रेरणादायी माध्यम भी था.
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/ प्रिंस पाण्डेय
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